Here India times has posted an article where they have mentioned the name of those tablet which should be avoided. They should not mentione those tablet names.
Dnt you think its promotion article instead of awearnes??
उत्तर प्रदेश में जीने के लिए नशे की मदद लेने वाले लोग अब शराब, हेरोइन, गांजा और(pix: Gettyimages)
अफीम का ही नहीं, बल्कि एलोपैथिक दवाओं का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। नशे के शिकार इन लोगों को प्राक्सीवॉन, एलजोलॉम, डायजापाम जैसी सिरप और टेबलेट आसानी से मिल जाते हैं। अमूमन खांसी और जिस्मानी दर्द को दूर करने वाली यह दवाएं हैं, लेकिन यह हर मेडिकल स्टोर पर आसानी से प्रिसक्रिप्शन के बिना मिल जाती है। शराब और बीयर के मुकाबले यह काफी सस्ती है। अब होम्योपैथ की टोन एड प्लस और सेटीबोल जैसी दवाओं का इस्तेमाल भी नशे के तौर पर किया जाने लगा है।
नशीली दवाओं का सेवन सोसाइटी के एक हिस्से में काफी धड़ल्ले से किया जा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि कफ सीरप और पेन किलर का सेवन सेहत पर काफी बुरा असर डालता है। इससे हार्ट और किडनी तो डैमेज हो ही सकते हैं, इंसान मानसिक रूप से बीमार भी पड़ सकते हैं।
गाजियाबाद-नोएडा सहित राज्य के अधिकांश बड़े शहरों में इंग्लिश मेडिसिन का चलन बढ़ता जा रहा है। सबसे अधिक पेन किलर प्रॉक्सीवान बिक रही है। क्योंकि कहने को तो यह दर्दनाशक दवा है, लेकिन नशे के लिए इसकी दो टेबलेट काफी है। केमिस्ट बताते हैं कि अंग्रेजी शराब का एक क्वॉर्टर जहां 85 से 100 रुपये का बैठता है, वहीं इन दवाओं से काफी सस्ते में नशा सिर चढ़कर बोलता है। केमिस्ट बताते हैं कि कफ सीरप में अल्कोहल की मात्रा ज्यादा होने से नशेड़ी इसका तेजी से इस्तेमाल कर रहे हैं, जो इनके भविष्य के लिए काफी घातक साबित होगा।




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