चन्दर सिंह कटारिया जी नमस्कार,
केशव नगर के पहाडी गद्दार हैं, उन के नाम आप अपना घर भी कर दोगे तो भी, ये तुम्हें गाली ही देंगे, पहाडीयों की ओकात सिर्फ दो पूडी, एक चम्मच सब्जी से ज्यादा नहीं है। यदि इन सालों को एक पैक दारू पिला दोगे तो ये साले आपके आगे अपना कच्छा खोल कर लेट जायेंगे । इन से बात करनी होतो इन से गाली देकर बात करो इन दो प्यार की भाषा नहीं आती इन से प्यार से बात करोगे तो ये सोचेंगे कि हम से डरता होगा। इन के लिये अपना पैसा व समय बर्बाद मत करो, सालों को सड्ने दो, यदि आप समाज सेवा करना तुम्हारा मकसद है तो किसी मन्दिर में या दूसरी जगह गरीबों को दान कर दो, या उन को खाना खिला दो उन की दुआ तुम्हें अच्छा फल देंगी। साले पहाडी तो जंगली जानवर हैं इस सालों को दिल्ली में आकर भर पेट खाना क्या मिलने लगा ज्यादा इतराने लगे हैं, इन को देखा होगा ये साले झाडियों से निकल कर नंग्गे जंगली जानवरों की तहर कच्छा/चडडी पहन कर दिल्ली आकर बस गये हैं लोगों के घरों में कपडे बरतन धोकर २५-३० गज में मंकान बना कर ज्यादा इतराने हैं, केशव नगर में इन्होंने सुधार समिति के नाम पर ओर लोगों को बेवकूफ बना कर २०-२० रुप्ये इक्टठे कर के मुफ्त की शराब पी है ओर ताश खेलें है, इसी वजय से केशव नगर का बेडा गर्क हुआ है। पहाडियों की वजह से यहां कुछ नहीं होने वाला, पिछ्ले ३-४ सालों से आपने एसोसिएशन बना कर केशव नगर का नाम दिल्ली के लोगों को जरूर बता दिया हैकि दिल्ली में केशव नगर के नाम से भी कोई कालोनी है, आपकी वजह से पहाडिय़ों को रहेने का व काम करने का तरीका भी सीख लिया है तो ये जान गये कि पढे लिखों में पहाडियों की अब चलने वाली नहीं , इस लिये ये आप से जलते हैं कि लोगों ने इन को २०-२० रुप्या देना बन्द कर दिया है, इन को अब पीने के लिये हराम की शराब नहीं मिल रही है, साला गन्जा रमेश गिरि गोस्वांमी जो कभी पान्डे की वजय से जिले सिंह से मिला था ओर कालोनी के लिये दिया गया सारा पैसा गन्जा जे. ई. से मिल कर खा गया, जहां तहां दो चार गलियां बनवाई ओर सार




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